उजाले से साक्षात्कार

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गिरिडीह : कार्तिक मास की अमावस्या की अंधेरी रात जगमग असंख्य दीपों से जगमगाने लगती है और हम अंधकार से प्रकाश की ओर लिए चलने हेतु मन ही मन कहते हैं-‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’! जिसका शाब्दिक अर्थ है अंधकार से प्रकाश यानी कि उजाले की तरफ बढ़ो और थोड़ी विस्तारित ढंग से व्याख्या की जाए तो अंधकार यानी कि बुराई और बुरी आदतों को त्यागकर प्रकाश यानी कि अच्छाई के पथ पर उन्मुख होना ही सही मायने में दीपावली मनाना है।यही वास्तविक साधना और आध्यात्म है।पर्व-त्योहार तो एक हेतु मात्र है। लेकिन हम अक्सर इस बात के वास्तविक मर्म को न समझकर भौतिकता और भौतिक चीजों को एकत्र करने की जोड़-तोड़ में जीवन गुजार देते हैं और उजाले से साक्षात्कार करने से चूक जाते हैं। उजाले से साक्षात्कार करने के लिए न हमें दीया,न बाती और न तेल की दरकार है बल्कि हम मन मन्दिर में दीप जलाने का निरन्तर प्रयास करके हमारे धर्मगुरुओं के बताए गए रास्ते पर चलकर पृथ्वी लोक से ऊपर उठकर सूर्यलोक से भी आगे बढ़कर उस उजाले से साक्षात्कार करें जिसे हम परमात्मा कहते हैं।परमात्मा ही सत्य हैं, सर्वव्यापी हैं, मंगलकर्ता हैं, सहृदय हैं सर्वशक्तिमान और परम् ब्रह्म हैं।इस संसार में परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी का सत्ता नहीं है।परमात्मा ही राम, रहीम, नानक, गौतम यीशु, महावीर आदि हैं। जब तक हमें उजाला रूपी अर्थात प्रकाशमय परमात्मा से साक्षात्कार हेतु ज्ञान उपलब्ध नहीं है तब तक हम धर्मांध बने रहेंगे और इस सुंदर संसार को अंधकार की खाई में ढकेलते रहेंगे।इसलिए आइए, आज हम संकल्प लें कि बाकी सारी बातों को एक और रखकर हम अपने आँखों में ज्ञान रूपी अंजनी लगाकर अपने-अपने हृदय के दीप को प्रज्ज्वलित करें और सच्ची दीपावली मनायें।

डॉ. ममता बनर्जी “मंजरी”✍🏼
साहित्यकार
गिरिडीह (झारखण्ड )

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