कोरोना और छठ-पूजा…

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रांची : कोरोना जैसे महामारी की चपेट में भारत ही नहीं पूरा विश्व आ गया था और आज भी परेशानियों का सामना कर रहा है।इस तरह की परेशानियों का सामना लगभग दो-तीन पीढ़ियों ने आज-तक नहीं किया था।कोरोना नामक दैत्य कितनों को निगल गया।सारा विश्व इससे निपटने के प्रयासों में लगा हुआ है।भारत तो त्योहारों का देश है।इस एक साल में न जाने कितने त्योहार आये।सभी त्योहारों को हम घर की चाहरदीवारी में ही अपने परिवार के साथ मनाए।दुर्गा-पूजा और दीवाली के बाद छठ महापर्व का त्योहार आता है।इस त्योहार को नदी,तालाब के किनारे ही भगवान भास्कर की पूजा करने की परम्परा है।छठ-पूजा सामुहिक रूप से आतिशबाज़ियों के साथ बड़े ही उत्साह और श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है।नदी-तालाब के किनारे मेला का माहौल बन जाता है। धरती की सारी सामग्रियों से भगवान सूर्य को अर्घ देते हैं। सभी तरह के फल-फूल यहाँ तक कि कुछ सब्जियों तक को भी पूजा में उपयोग करते हैं।छठ-पूजा सूर्य,प्रकृति, जल, वायु सभी को समर्पित है।यह पूजा पृथ्वी पर जीवन बहाल करने के लिए धन्यवाद स्वरूप है।छठ में कोई मूर्ति पूजा नहीं की जाती है।सीधे उगते सूर्य और डूबते सूर्य की पूजा की जाती है।लेकिन इस समय हमें थोड़ा बदलाव करना अति आवश्यक है।समय बड़ा बलवान होता है।समय के सामने हर किसी को नत-मस्तक होना पड़ता है।आज समय की मांग है कि हम समाज और जनहित की दृष्टि से छठ-पूजा भी सुरक्षा के दायरे में रहकर करें ।हमारे शास्त्रों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं। भगवान उसी की मदद करते हैं जो अपनी मदद स्वयं करता है।किसी प्राकृतिक आपदा से हमें भगवान तभी बचा पायेंगे जब हम स्वयं उससे बचाव का उपाय करें।इस कोरोना से निपटना भी है और अपने आराध्य की आराधना भी करनी है।नदी,तालाबों के किनारे मेला जैसा माहौल उत्पन्न न कर यदि हम अपने-अपने घरों में पूजा करें तो भगवान की भक्ति में कोई कमी नहीं आयेगी।आज शहरों में स्वतंत्र घरों की कमी है,फिर भी हम छतों या वाॅलकनी में भी पूजा कर सकते हैं ।यदि मेरा परिवार , स्वयं, परिजन,परिचित सभी स्वस्थ और सकुशल हैं तो निश्चित रूप से हमें खुशी मिलेगी। सोचिए,संतान की खुशी देखकर माता-पिता को जितनी खुशी होती है उतनी ही खुशी तो परमपिता परमेश्वर को भी होगी? अतः यह कतई नही कह कह सकते है कि घर से बाहर निकलकर सामुहिक रूप से पूजा करने से ही भगवान प्रसन्न होंगे। भगवान तो भाव के भूखे होते हैं। उन्हें सारी सामग्रियों की भी आवश्यकता नहीं है।वो तो जल और पुष्प,पत्र से भी हमारी पूजा स्वीकार करते हैं ।हम आज स्वस्थ रहेंगे, अपने और अपने प्रिय जनों को सुरक्षित रख पायेंगे, तभी कल अधिक उत्साह पूर्वक माहौल में भगवान की पूजा कर सकते हैं। अतः आवश्यक है कि सभी भक्तजन भक्ति करें, पूजा-अर्चना करें, लेकिन सुरक्षा कवच की परिधि में रहकर।जय सूर्य नारायण ।

पुष्पा पाण्डेय
राँची

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