बचपन बचाओ

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रांची : जीवन की तीन अवस्थाओं में बचपन को स्वर्णिम अवस्था माना गया है। जिस बचपन में पूर्ण बेफ़िक्री के साथ सिर्फ हँसना-हँसाना, खेलना-खेलाना ही हो उसे स्वर्णिम अवस्था ही तो कह सकते हैं।बचपन बहुत पवित्र और निश्छल होता है।सभी मानसिक विकारों से दूर, समाज के हर वर्ग के बच्चे अपने दोस्त होते हैं। बचपन फर्क करना जानता ही नहीं। बालू के ढेर में घर बनाना, मिट्टी का घरोंदा बनाना,ढीली पैंट और नंगे पाँव कीचड़ में खेलना- इससे बढ़कर कोई खुशी हो ही नहीं सकती। लट्टू नचाते हुए दोस्तों के साथ प्रतिस्पर्धा में अपनी जीत पर उन्मुक्त हँसी, किसी अस्तित्व की हँसी से कम नहीं है।आज की लडाई को कल भूल जाना,इस बचपन की एक खास विशेषता है। तनाव रहित बचपन ही परिपक्व होकर एक जिम्मेवार और सफल नागरिक के रूप में विकसित होता है।लेकिन आज ये बचपन विलुप्त होता जा रहा है।तीन साल की उम्र में स्कूल गये और वहीं से शुरू हो गयी तनाव पूर्ण जिन्दगी। गृह- कार्य का तनाव और माता-पिता का दबाव बच्चों की मासूमियत पर ग्रहण लगा देता है।भारी-भरकम झोले का बोझ से बचपन दबता चला जाता है। दयनीय स्थिति तब आती है, जब माता-पिता स्कूल में अच्छे प्रदर्शन के लिए दबाव डालते हैं।इस प्रतिस्पर्धा के युग में माता-पिता भी अपने बच्चे को सबसे आगे देखना चाहते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी बनाना चाहते हैं।हर माँ-बाप की ये चाह होती है। पढ़ायी के साथ-साथ अन्य विधाओं में भी पारंगत कराना चाहते हैं।जैसे चित्रकारी, संगीत, नृत्य आदि।इन सभी के बीच बच्चे का बचपन खो जाता है। वो क्या चाहता है,उसकी रुचि किस तरफ है, ये जाने बगैर माता-पिता अपनी इच्छा उसपर आरोपित कर देते हैं। इस सबके बींच वह कागज की नाव बनाना भूल ही जाता है।ये तो हुई मध्यवर्गीय परिवार की बात। कुछ लोग मजबूरी में गरीबी के कारण अपने बच्चों का बचपन छीन लेते हैं। उसे छोटी उम्र में ही किसी-न-किसी काम में लगा देते हैं। बाल-मजदूरी भी इसी मजबूरी का परिणाम है। दुकानों या घरों में नौकर रहने पर मजबूर होते हैं।इसी आपाधापी में वह युवा-अवस्था में आकर एक चौराहे पर खड़ा हो जाता है।वह समझ नहीं पाता है कि कौन-सी राहें उसे मंजिल तक पहुँचाएगी। यही कारण है कि आज युवा-वर्ग में अवसाद की स्थिति देखने को मिलती है।समाज में इस वर्ग की स्थिति को देखकर लगता है कि अब जल्द-से जल्द सचेत होने की आवश्यकता है। बचपन को बचाना होगा।सिर्फ माता-पिता ही नही, समाज के हर नागरिक की ये जिम्मेवारी होनी चाहिए कि किसी का बचपन गिरवी नहीं रखे।काम के साथ उसकी पढ़ाई और उसकी स्वतंत्रता कायम रखे। अतीत की नींव पर ही वर्तमान और भविष्य का महल बनता है।सहज और स्वाभाविक बचपन ही आगे चलकर दृढ़ आत्म- विश्वासी और विवेकी इंसान बनता है।


पुष्पा पाण्डेय
राँची

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