बच्चों में खोता जा रहा बचपन…

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गिरिडीह : स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बच्चों के प्रति प्रेम को देखते हुए उनके अवतरण दिवस को ‘बाल-दिवस’ के रूप में मनाने का उद्देश्य यही था कि देश का हर बच्चा खुशहाल और जागरूक रहे।इसके लिए बच्चों के अविभावकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर बच्चों को शिक्षा देकर उनकी प्रतिभा को उभारने का और स्वस्थ परिवेश में बच्चों के चतुर्दिक विकास का अवसर प्रदान तो किए ही,साथ ही बच्चों को सही दिशा प्रदान करके आगे बढ़ाने के लिए यथासाध्य प्रयत्नशील रहे।देश विकास के ग्राफ में बढोत्तरी हुई।अविभावकों के प्रयास आज भी जारी है लेकिन समय-चक्र के बदलने के साथ-साथ बच्चों की जीवन-शैली में अकल्पनीय तब्दीली आई।समय के साथ-साथ मानों बच्चों ने अपना उन्मुक्त बचपना खो दिया। बच्चों के कंधों पर किताबों की थैली भारी पड़ने लगी। बच्चें खेल के मैदान भूल गए।बाग-बगीचों में अहरह बच्चों की किलकारियाँ गूँजना कम हो गया।अर्थात इनकी जिंदगी घर से स्कूल और स्कूल से घर आने के बाद टीवी,कम्प्यूटर और मोबाइल में सिमटकर रह गया।जिसके कारण आज कई समस्याएँ सामने आ खड़ी हो गई।बाकी बातों को कुछ पल के लिए छोड़ दिया जाए और आज की तिथि में बच्चों की स्थिति पर गौर फरमाया जाए तो हम पाएंगे कि कोरोना काल में बच्चें न सिर्फ घरों में अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं बल्कि कई मानसिक परेशानियों का सामना करते-करते बच्चों का दिल व दिमाग विकारग्रस्त हो रहा है जिसके परिणाम स्वरूप बच्चों में चिड़चिड़ापन,ज़िद,तनाव,आक्रामकता,अवसाद आदि बढ़ता ही जा रहा है जो जीवन के खतरनाक संकेत मानने से हम इनकार नहीं कर सकते हैं।बच्चें शारीरिक,मानसिक और सांवेगिक रूप से असन्तुलित होते जा रहे हैं।हम सही समय पर भावनात्मक रूप से इनका साथ देकर बच्चों के भविष्य सुरक्षित रखने में अपनी भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि आज के बच्चे कल के भविष्य हैं।अतः जरूरी है कि बच्चों को स्वच्छ व स्वस्थ वातावरण देकर हम अपने साथ उनके रिश्ते मजबूत करें और देश के भावी कर्णधार बनने में उनकी सहायता करें। ‘बाल-दिवस’ की सार्थकता तभी संभव है।

डा ममता बनर्जी मंजरी, साहित्यकार, गिरिडीह

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